Tuesday, August 15, 2017

गाँव के बच्चे

वे गाँव के बच्चे
जो प्राइमरी स्कूल में
पढ़ते हैं।
बोरे और टाट पर
बैठते हैं।
उनके पास सुंदर
स्कूल बैग नहीं होता
कपड़ा या सीमेंट की बोरी सिल
एक झोला बनाते हैं
उसी को बस्ता कहते हैं।
उसमें बड़ी तहजीब से
अपनी किताबें सम्हालते हैं।
अब वे तख्ती पर नहीं लिखते
न ही कालिख खोजते हैं।
अब वे भी पेन्सिल से
अक्षर सीखते हैं।
अब वे खड़ियामिट्टी
बुतका दवात रोशनाई
स्याही सेंठा की कलम
सबसे मुक्त हैं।
वे गाँव के बच्चे
प्राइमरी स्कूल में
पढ़ते हैं
एक पाख
या कहें महीनों पहले से
स्वतंत्रता दिवस
गणतंत्र दिवस
गाँधी जयन्ती की
तैयारी करते हैं।
महीनों तैयारी में उल्लसित रहते हैं।
वे गाँव के बच्चे
कविता और भाषण का
एक-एक शब्द
तैयार करते हैं
रटते हैं
दोहराते हैं।
वे गाँव के बच्चे
इन राष्ट्रपर्वों
के बारे में
जानते हैं।
गौरवान्वित होते हैं।
वे गाँव के बच्चे
नंगे पैर ही सही
प्रभातफेरी निकालते हैं।
अपने शरीर के सामर्थ्य से बढ़कर
भारत माता की जय
वंदेमातरम्
जयहिंद बोलते हैं।
प्रसंशा के दो शब्द
और पीठ थपथपाने
खुश हो जाते हैं।
गाँव के बच्चे
बहुत योजनायें बनाते हैं
स्वतंत्रता दिवस के लिये
गणतंत्र दिवस के लिये
और अन्य पर्वों के लिये
प्रभातफेरी के बाद
अपनी कविता
भाषण सुनाते हैं
लड्डू खाते हैं
शाबाशी पाते हैं
और आजादी का भाव लिये
गर्व से भरे
घर लौटते हैं।
वे गाँव के बच्चे
जिन्होंने देश देखा भी नहीं होता
लबरेज होते हैं
राष्ट्राभिमान से।
वे गर्व करते हैं भगतसिंह पर
लोकमान्य तिलक
वीरसावरकर
गाँधी, आजाद
लाला लाजपतराय
और अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों
क्रान्तिकारियों पर।
वे गाँव के बच्चे
बताशा देख
खुश हो जाते हैं।
छोटे से पुरस्कार पर
उछल पड़ते हैं।
बढ़ जाता है
उनका उत्साह
और वे बहुत कुछ करना चाहते हैं
अपने लियै
परिवार के लिए
गाँव के लिए
देश के लिये।
पर बड़े होकर
जब वे शहर पहुंचते
तो पहले ही कदम फर
उनकी कल्पना में
दरार आ जाती है
कदम दर कदम
उनकी कल्पना मरने लगती है
और उनमें जमने लगता है
नगरीय शैवाल
जिसकी परिधि केवल
अपने तक सीमित रहती है।
अब भी राष्ट्रीय पर्वों पर
उसमें उमंग होती है।
पर अपने आप में घिरी नगरीय सभ्यता में
उसे वो गाँव सी उमंग नहीं मिलती
वो गांव सा उत्साह नहीं दिखता।
राष्ट्रपर्वों को
एक रविवारीय वीरानी दिखती है।
वे चुपचाप उसे देख
लौट आते हैं अपनी
प्रकाश विहीन कोठरी में
और प्रकाश के डिब्बे के आगे
बैठ जाते हैं ।
देखते हैं
लालकिले की प्राचीर
भव्यभाव
सुनते हैं भाषण
पर उन्हें वह
निश्छलता और
उल्लास नहीं दिखता
जो प्राइमरी के प्रभातफेरी में
दिखता था।
उतनी खुशी नहीं मिलती
जो लड्डुओं बताशों
से मिलती थी।
ठंडे निःश्वास के साथ वे
मन को मना लेते हैं
यह कहकर कि
शहर में ऐसे ही होता है।

Monday, June 26, 2017

मैं

इस संसार के लिये
हम उतने ही अनोखे हैं
जितने हमारे
पूर्वज थे।
यह संसार हमारे लिये
उतना ही अनोखा है
जितना हमारे पूर्वजों के लिये था।
बस अंतर यह है कि
वे इस अनोखेपन के साथ
इस अनोखेपन को मानकर
रमते थे, जीते थे।
हमने इस अनोखेपन को
आक्रान्त कर
पदाक्रान्त कर
जीना सीख लिया है।
संसार के अनोखेपन से
बढ़कर
स्वयं को अनोखा मान लिया है।
हमारे पूर्वज इठलाते नहीं थे
अकड़ नहीं दिखाते थे
आँख नहीं दिखाते थे
न तर्जनी उठाते थे।
पर हमने फावड़ा और क्रेन
उठाना सीख लिया है
डायनामाइट लगाकर
चट्टान और पर्वत उड़ाना सीख लिया है।
हमारे पूर्वज
प्रार्थना करते थे
इस धरती की
कि जो भी मैं खोदूं
तुम तुरंत कर लो भरपायी
कहते थे
"यत्ते भूमे विखनामि
क्षिप्रं तदपि रोहतु"
पर हमने
यह विनय भाव
छोड़ दिया है
यह प्रार्थना भूल गये हैं।
क्योंकि हमारा अनोखापन
हमारी नजर में
सृष्टि से बढ़कर है।।
अब हम याचना नहीं करते
आगे बढ़ते हैं।
पूर्वजों के मूल्यों में
नहीं जीते।
अपने नये मूल्य गढ़ते हैं।
हम सफलताओं को मुट्ठी में भर
रोज नये पहाड़ चढ़ते हैं
नापते हैं नयी धरती
और नयी उड़ान भरते हैं।
हम सभी को तुच्छ, निरीह
निम्न, बुद्धिहीन समझते हैं।
या यूँ कहें कि अपनी उन्नति - प्रगति से
उनको कमतर सिद्ध करते हैं।
हम प्राणियों में
स्वयंसिद्ध, स्वयंभाषित
स्वयंभू, स्वघोषित सर्वबुद्धिमान
प्राणी हैं।
इसलिये हम पूर्वजों जैसे
विनीत नहीं होते।
उन सा प्रकृति के प्रति
अनुग्रहीत नहीं होते।।
-ममता त्रिपाठी

मैं क्यों तुमको राग सुनाऊं?

मैं तुम्हें क्यों राग सुनाऊं
जब वीणा के स्वर सोये हैं।
तंत्री में जब राग नहीं है
शब्द बने अक्षर सोये हैं।
मानस में भूचाल मचा है
अंतस् झंझावात बसा है
कौड़ी भर की इस दुनिया में
कौड़ी में ही मन रमता है।।
फिर बोलो कैसे राग सुनाऊं?
स्पन्दन मृतप्राय पड़े हैं
क्रन्दन से हृदय भरे हैं
फिर कैसे मैं खुलकर गाऊं? 

Thursday, June 22, 2017

तुम्हारा जल जाना ही अच्छा है

तुम जल रहे हो
इसलिए नहीं जल रहे हो
कि जलना तुम्हारा स्वभाव है।
तुम दहक रहे हो
अंगार बन रहे हो
इसलिये नहीं कि
तुम आग हो।
तुम आग नहीं
आग को समर्पित तृण हो
जलो खूब जलो
दहको खूब दहको
पर याद तुम घर-घर चूल्हा
जलाने वाले अंगार
नहीं बन सकते
तुम वह आग और
अगियार नहीं बन सकते।
क्योंकि वह आग
जलती है स्वस्ति के लिए
स्वधा के स्वर के लिये।।
पर तुम तो जलते हो
दहकते हो
दूसरों को
जलाने के लिये
दूसरों को भस्मीभूत बनाने के लिए
इसलिए तुम अर्चि नहीं हो
तुम अंगार नहीं हो
तुम ज्वाल नहीं हो।
तुम तृण हो
खर-पतवार हो।
तुम्हारा जल जाना ही
भस्म हो जाना ही
राख बनना
और उड़ जाना ही।
अच्छा है
परिवार के लिए
समाज के लिए
राष्ट्र के लिए
विश्व के लिए
ब्रह्माण्ड के लिए।

Wednesday, October 5, 2016

महिला मेधाविनी है

महिला मेधाविनी है
जन्म ही नहीं जन्मपूर्व से ही।
वह मेधाविनी है।
विजेता है,
सृजेता है,
प्रणेता है,
नेता है,
और गृह-देवता है।
स्वाभिमानिनी है।
महिला मेधाविनी है।।
स्वस्ति है
ज्योति है
कुटुम्ब की सेतु है
आत्मीय प्रतीति है।
राग है प्रीति है।
अभिमानिनी है
महिला मेधाविनी है ।
सर्वकार्यकर्त्री है
जगत् की नेत्री है।
परिवार की भर्त्री है।
ब्रह्मा की साक्षात् अनुकृति हैं।
शक्तिधारिणी है
महिला मेधाविनी है ।
                 ममता त्रिपाठी 

Friday, September 30, 2016

लहसुन की उत्पत्ति - कथा

लशुन (लहसुन) आयुर्वेद में शाकवर्ग के अन्तर्गत आता है अर्थात् यह एक शाकीय पौधा है। प्रख्यात आयुर्विद् वाग्भट विरचित आयुर्वेद ग्रंथ 'अष्टांगहृदयम्' के उत्तरप्रकरण के रसायनविधिरध्याय में लहसुन की उत्पत्ति से संबंधी एक रोचक कथा प्राप्त होती है। जिसमें बताया गया है कि लशुन की अशुभ उत्पत्ति हुयी है ।देवताओं और दैत्यों द्वारा समुद्रमंथन से जो अमृत निकला राहु ने उस अमृत में से चुराकर कुछ अमृत पी लिया । तब भगवान् विष्णु ने तत्काल सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया।राहु के गले में से जो अमृत की बूंदें भूमि पर गिरीं उनसे लहसुन की उत्पत्ति हुयी। इसी दैत्यदेह से उत्पत्ति की मान्यता के कारण द्विज इसको नहीं खाते थे।
यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि साक्षात् अमृत से उत्पन्न होने के कारण यह अमृत के समान गुणकारी है। लहसुन वात रोग की प्रमुख औषधि है। आयुर्वेद में शीतकाल में अधिक लहसुन सेवन का विधान है। सामान्यतः सभी ऋतुओं में लहसुन सेवनयोग्य है परन्तु शीतकाल उसके लिये सर्वाधिक उपयुक्त है।

Tuesday, September 20, 2016

संस्कृत पर कुतर्की प्रहार के प्रति कड़ा प्रत्युत्तर

संस्कृत भाषा एवं साहित्य सभी के जिज्ञासा का विषय है अतः विश्व के अनेक देशों में इसपर अध्ययन व शोध हुआ है और हो रहा है । अनेक विद्वानों ने इसे समृद्ध किया है और  अकूत ज्ञानराशि को प्रकाश में लाने का प्रयास किया है। दूसरी तरफ ऐसे भी विद्वान् हैं जिन्होंने संस्कृत का अध्ययन किया एवं संस्कृत भाषा के प्रति अभूतपूर्व योगदान दिया परन्तु अन्ततः उनको वेद जैसी ज्ञानसम्पदा 'गड़रिये का गीत' लगी। हालांकि यह भी एक पक्ष है कि मैक्समूलर को विवश हो ऐसा लिखना पड़ा क्योंकि भारतीय ज्ञान परम्परा और वेद की स्तुतिप्रसंशा से उनका लेखन रिजेक्ट हो जाता और उन्हें ग्रांट अर्थात् अनुदान न प्राप्त होता अंग्रेज सरकार से। एक बार उनका लेखन रिजेक्ट हो भी चुका था और ग्रांट शब्दकोशीय लेखन को प्राप्त हुआ था।
यह तो उस समय की बात है जब हम परतंत्र थे राजनीतिक स्तर पर। हमारी मनीषा अन्धकार से प्रकाश का बाट जोह रही थी और स्वतंत्रता की एक क्षीण आशा मात्र हमारे हृदयों में थी।हालांकि उस समय भी हमारी मनीषा पूर्णतः तमसान्धकार से आवृत्त न थी। ज्ञानेन्दियाँ सम्यक् थीं। उस समय किसी ने कुछ लिखा हमारे विषय में और हम प्रायः मौन रहे। लिखने का प्रोजेक्ट भी अंग्रेज सरकार का था और लेखक भी उसी के कृपापात्र। हालांकि भारतीय ही नहीं अपितु वैश्विक राजनीति में कृपापात्रों ने बहुत उथल-पुथल मचायी है, तिल का ताड़ और ताड़ का तिल बनाया है, अस्तित्ववान् को आस्तितवहीन व आस्तात्वहीन को अस्तित्ववान् की संज्ञा दी है। कुल मिलाकर पालित, पोषित, नियंत्रित जिस प्रकार का व्यवहार करता है वैसा ही व्यवहार कृपापात्रों ने किया है ।
आज भी ये ग्रांट वाला प्रसंग व यह व्यवस्था ज्यों की त्यों है। आज हम स्वतंत्र है पर हमारी मनीषा का एक भाग परतंत्र है। ग्रांट पाने और कृपापात्र बनने की लालसा व तात्कालिक स्वार्थ के लिये  वह अपनी ही ज्ञान परम्परा के प्रति गुर्राता है, आँख दिखाता है, उसका तिरस्कार करता है, पग-पग पर कुतर्क कर व्यर्थ के प्रश्न उपस्थित करता है। किसी भी बात और व्यवस्था को लेकर समन्वयगामी दिशा में बढ़ने के बजाय खुरच-खुरचकर समस्याओं को बढ़ाने वाले कुतर्क खड़ा करता है ।उसकी पूरी मनीषा व्यवस्थापन व समन्वयन पर नहीं अपितु विध्वंस व विखंडन पर शोध करने में गल जाती है और वह तथाकथित परपोषित समृद्धि के मद में खोया रहता है ।उसे कई बार पता भी नहीं होता कि वह क्या अनर्थ कर रहा है । ऐसे लोगों से कालान्तर में वैचारिक सुगन्धि के स्थान पर वैचारिक सड़ाँध और दुर्गन्ध का प्रवाह होता है। पितृऋण जैसी बातें इन्हें पैट्रियार्कल (पितृसत्तात्मक) लगती हैं और पूरी ज्ञान परम्परा रामकृष्ण का नाम आने पर 'मिथ' बन जाती है और महिषासुर का नाम आने पर वही इतिहास। ऐसे लोग जब फेमिनिज्म व पैट्रियार्की की बात करते हैं तो हमारे सर्वोच्च दार्शनिक तत्त्व जो जेंडर न्यूट्रल है उसे नजरअंदाज कर सतही व्याख्या पर उतर आते हैं। अर्थात् जहाँ दार्शनिक चिन्तन के माध्यम से सतह से उठने की बात होती है वहाँ ये अपने 'दर्शन' प्रवर्त्तन से पुनः सतह पर आने का कार्य करते हैं। इस प्रकार ऊर्ध्वंगति के भ्रम में अधोगामी बनते हैं ।
हमारे देश के अधिकांश मानस की एक मानसिक व मनोवैज्ञानिक बीमारी है कि हम उसी को अधिक महत्व देते हैं जिसे किसी दूसरे देश से कोई सर्टिफिकेट मिला हो।इसी हमारी मानसिक अवस्था के कारण हमारे देश की मनीषा स्वदेशोमुख होने के बजाय परदेशोन्मुख हो गयी है । यद्यपि विदेशी डिग्री होने में कोई बुराई नहीं है।
आज भी ग्रांट , गाॅडफादर और उससे भी बढ़कर विरोधी बनकर प्रसिद्धि का लोभ जस का तस जारी है। बस पात्र बदलते रहते हैं ।यदि आप अपने अस्तित्व को कोसें और उससमय जबकि आपका अस्तित्व बहुत महत्त्वपूर्ण हो तो पूरा विश्व आपको हाथोंहाथ लेगा ।क्योंकि आप इनसाइडर हैं, साक्षी हैं, जिसको कोस रहे हैं उसी के एक भाग हैं। आपसे अधिक वैलिड साक्षी विपक्षी को दूसरा न मिलेगा अतएव वह आपको क्रीतदास बना रहा है और आप क्रीतदास बन उसी की भाषा बोल रहे हैं ।
उन्हीं के मतलब का लिख रहा हूँ।
जबान मेरी है बात उनकी
उन्हीं का मतलब निकल रहा है ।
कलम मेरी है दावात उनकी।।
फकत मेरा सिर्फ हाथ हिल रहा है ।
उन्हीं का मतलब निकल रहा है ।।
आजकल अनन्या जी भारतीय ज्ञान परम्परा के प्रति अनन्य कुतर्कपूर्ण भाव का परिचय पदे-पदे दे रही हैं ।विचारने का विषय है कि यह अनन्यभाव भला क्यों? कहीं इसकी ओट में सुनियोजित प्रायोजित दुर्भाव तो नहीं है । दुंदुभी मोदी की मुदित न कर रही जिनके मन को आज उन्हें मोदी को घेरने के लिये ज्ञान परम्परा का दामन पकड़, उसे दागदार दिखा विमर्श में उतना पड़ रहा है ।कुतर्क गढ़ना पड़ रहा है ।
पढ़िये प्रो. गिरीश नाथ झा द्वारा अनन्या जी की 'अनन्यभक्ति' को सम्बोधित एक खुला पत्र-
http://indiafacts.org/open-letter-ananya-vajpeyi-sanskrit/

Monday, August 1, 2016

हथकरघा

करघे पर
एक-एक सूत
जोड़ती उँगलियाँ।
केवल
कपड़े नहीं बुनतीं
कपड़ों के साथ
स्नेह भी बुनती हैं।

स्वप्न

 सृजन का
हर सपना
साकार होता है।
स्वप्न
यथार्थ में
आकार लेता है।
बस स्वप्नद्रष्टा
होना चाहिए।
हर सपना
सच होगा
बस सच्चा
प्रणेता चाहिए।।

Sunday, July 31, 2016

बेटियाँ

Gaurinanadana 

बेटियाँ स्नेह हैं,
स्नेहसिक्त अभिव्यक्ति हैं।
बेटियाँ सृजन हैं
और संसृति हैं।।
यश और कीर्ति की
मूक अभिव्यक्ति हैं।
बेटियाँ कान्ति हैं
आन्तरिक शक्ति हैं।।
लक्ष्मी सरस्वती ही नहीं
साकार प्रकृति हैं।।
बेटियाँ इस धरा पर
साक्षात् ब्रह्म की अनुकृति हैं।

Thursday, July 28, 2016

संकीर्णता

थोड़ा मन को बड़ा करो
सब हरा-भरा हो जायेगा।
सूखी न होगी वर्षाऋतु,
वसन्त न सूखा जायेगा।।
सँकरे मन की सँकरी गलियों को
थोड़ा विस्तार दो।
थोड़ा आँखें और खोलकर
देखो इस संसार को।। 

Monday, July 25, 2016

जीवन

जीवन एक जंजीर नहीं है।
यह प्रभु का उन्मुक्त हास है।
बस यूँ बहता नीर नहीं है।
जीवन एक जंजीर नहीं है।
गंगा का यह जल है पावन
जो करता है कलुष प्रक्षालन।
जीवन नीरव नीड़ नहीं है।
जीवन एक जंजीर नहीं है।।
रक्त कसैला विष भी कटु है
शत्रु जो इसका वह बहु पटु है
जीवन उसकी पीर नहीं है
जीवन एक जंजीर नहीं है
प्रवाह यह महासागर तक
कभी न रुकती इसकी गति-युति
यह चलता हुआ शरीर नहीं है
जीवन एक जंजीर नहीं है।
गति है लय है छन्द ताल है
वाद्यों का यह वाद्यजाल है
यह केवल मंजीर नहीं है
जीवन एक जंजीर नहीं है।। 

Saturday, July 23, 2016

एकाकीपन

कई बार घर के आँगन में
कितने भी सूनेपन में
चहँक उठती थी गौरैया औ
कलरव होता था मन में।
अब आँगन-आँगन मन खोये हैं
संवेदनाओं के स्वर सोये हैं।
सुख में साथ नहीं हैं अब सब
दुःख में भी एकाकी रोये हैं।।
भीड़ में भी एकाकी हैं
मन से पूरे संतापी हैं।
अनेक राग भरे स्वर में भी
पर एक राग के अभिशापी हैं।।
आभासों में ही रह जाते
आभासों में हम जीते हैं।
नहीं ध्यान है हमको कि
ये भरे हुये मन कितने रीते हैं?
-ममता

Saturday, July 9, 2016

भुजंग सरीखा कौन खड़ा है

हम चन्दन हैं
तुम चन्दन हो
हम-तुम दोनों चन्दन हैं।
पर यह भुजंग सरीखा कौन खड़ा है
जिसने हमको आधार बना
वैमनस्य का महल गढ़ा है।।

Thursday, December 30, 2010

वेदाङ्गानि

     छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते।
ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रौतमुच्यते॥
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्।
तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते॥ (पाणिनीय शिक्षा)
इदानीं प्रत्येकं वेदाङ्गानां संक्षिप्तं लक्षणमस्ति। वेदस्य अङ्गम् इति वेदाङ्गम्। वेदाङ्गं वेदस्य षट् शृङ्गाणि सन्ति यथा-शिक्षा, कल्पं, निरुक्तं, छन्दः, ज्योतिषं व्याकरणम् चेति-
शिक्षा व्याकरणं छन्दो निरुक्तं ज्योतिषं तथा।
कल्पोचेति षडङ्गानि वेदस्यार्षमनीषिणः॥
विद्यायाः परापरा चेति विभागद्वयं वर्तते मुण्डकोपनिषदि, वेदाङ्गानि अपरा विद्यान्तर्गतानि तत्र-
       तत्रापरा  ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्व वेदः।
       शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषम्॥
शिक्षा- वेदस्य अर्थज्ञानाय स्वरज्ञानाय प्रथमम् आवश्यकं तत्त्वं शिक्षा अस्ति।
स्वरवर्णाद्युच्चारणप्रकारो यत्र शिक्ष्यते उपदिश्यते सा शिक्षा। (ऋग्वेदभाष्य भूमिका)
अनया वेदमन्त्राणाम् उच्चारणं यथायथं शुद्धं सम्पाद्यते।
तैत्तिरीयोपनिषदि शिक्षा वेदाङ्गस्य प्रयोजनमुक्तम्- वर्णः, स्वरः, मात्रा, बलं, साम, सन्तानः चेति षड्ङ्गानि शिक्षायाः अभिधीयते-
शिक्षा व्याख्यास्यामः। वर्णः, स्वरः, मात्रा, बलं, साम, सन्तानः इत्युक्तः। (तैत्तिरीयोपनिषदीय शिक्षाध्याये)
वर्णः- त्रिषष्टिः चतुःषष्टिर्वा वर्णाः शम्भुमते मताः। (पाणिनीय शिक्षा)
स्वरः- दुष्टो मन्त्रः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो नतमर्थमाह।
सवाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोपराधात् (नारदीय शिक्षा)
मात्रा:- एकमात्रो भवेद् ह्रस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते त्रिमात्रास्तु प्लुतो ज्ञेयो व्यंजनस्त्वर्धमात्रकः। (छन्दोमञ्जरी)
बलम्- स्थान प्रयत्नो बलम्।
साम- साम निषादादि।वर्णानां दोषरहितं मार्धुर्यादि गुणान्वितोच्चारणं सामपदेन अभिधीयते।
सन्तानः-“सन्तानौ विकर्षणादि।
कल्पः- “हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते।
कल्पौ वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्येण कल्पना शास्त्रम्।इति कल्पलक्षणम्।
कल्पसूत्राणि मूलतः चतुर्विधानि- श्रौतसूत्राणि, धर्मसूत्राणि, गृह्यसूत्राणि, शुल्बसूत्राणि च।
श्रौतसूत्राणि- श्रुतियुक्त यागविधिप्रकारकानि श्रौतसूत्राणि। उदाहरणार्थम्-
आश्वालायन श्रौतसूत्रम्, सांख्यायन श्रौतसूत्रम् (ऋग्वेदे), कात्यायन श्रौतसूत्रम् (शुक्लयजुर्वेदीयं), बोधायय-आपस्तम्ब-हिरण्यकेशी-वैखानस-भारद्वाज-मानव श्रौतसूत्राणि (कृष्णयजुर्वेदीयं)
आर्षेय श्रौतसूत्रम्, लाट्यायन श्रौतसूत्रम् द्राढ्यायन श्रौतसूत्रम्, जैमिनीय श्रौतसूत्रम् (सामवेदीयं), वैतान श्रौतसूत्रं (अथर्ववेदीय)
शुल्बसूत्रम्-शुल्बं नाम मापक्रिया।
गृह्यसूत्राणि- आश्वालायन गृह्यसूत्रं, सांख्यायनगृह्यसूत्रम् (ऋग्वेदे), पारस्कर गृह्यसूत्रम् (शुक्लयजुर्वेदीये), बोधायन-भारद्वाज-आपस्तम्ब-हिरण्यकेशी-वैखानस-बाधूल-काठक-वाराह गृह्यसूत्राणि (सामवेदे), गोभिल-खादिर-जैमिनीय गृह्यसूत्राणि (अथर्ववेदीयम्)
धर्मसूत्राणि- धर्मसूत्राणि यथा बोधायन-गौतम-आपस्तम्ब-हिरण्यकेशी-वशिष्ठ-विष्णु-वैखानस-हारीत-भारद्वाज-शंख-मानव-बृहस्पति इत्यादीनि धर्मसूत्राणि।
निरुक्तम्- निरुक्तं श्रोतमुच्यते। निघण्टुग्रन्थस्य व्याख्यानमेव निरुक्तमिति। निरुक्तग्रन्थः यास्कस्य कृतिः अस्ति। निरुक्तं पञ्चविधं श्रूयते-
वर्णागमौ वर्णविपर्ययश्च द्वौ चापरौ वर्णविकारनाशौ।
धातोस्तदर्थाभिनयेन योगस्तदुच्यते पञ्चविधं निरुक्तम्॥
निरुक्ते नैघण्टुककाण्डं, नैगमकाण्डं, दैवतकाण्डञ्चेति मूलकाण्डत्रयमस्ति।
छन्दः- “छन्दासि छादनात् इति निरुक्तम्।
छन्दः पादौ तु वेदस्य
तैत्तिरीयसंहितायाम् उक्तम् अस्ति यत् छन्दः आत्मानं छादयित्वा अग्निसविधं गच्छति-
ते छन्दोभिरात्मानां छादयित्वो पयंस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम्। (तैत्तिरीय संहिता)
छन्दांसि मूलतः द्विधानि-वैदिकानि लौकिकानि च।
यदक्षरपरिमाणं तत्छन्दः” (कात्यायन सर्वानुक्रमणी)
तैद्वदेव छन्दोऽक्षरसंख्यावच्छेदकमुच्यते-इति” (वृहत् सर्वानुक्रमणी)
छन्दः शास्त्रस्य प्रवर्त्तकः आचार्यः पिङ्गलः छन्दः सूत्रं तस्य कृतिः।
ज्योतिषाम् –“ज्योतिषामयनं चक्षुः ज्योतिषं वेदपुरूषस्य चक्षुरूपेण कल्प्यते तत्र तावत् ज्योतिषं नाम कालविज्ञापक-शास्त्रम्-
          यथा शिखा मयूराणां नागानां गणयो यथा
        तद्वत् वेदाङ्ग शास्त्राणां गणितं मूर्ध्नि स्थितम् (वेदांग ज्योतिषम्)
          *************************************************
इदमन्धतमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम्
शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं दीयते
चतुर्णामपि वेदानाम् पृथक् पृथक ज्योतिशास्त्रमासीत् सामवेदस्य ज्योतिषं इदानीं नोपलभ्यते
(१)आर्ष ज्योतिषं (ऋग्वेदीयम्) षट्त्रिशत् पद्यात्मकम्
(२) याजुष् ज्योतिषम् (यजुर्वेदीयम्) अनच्त्वारिंशत् पद्यात्मकम्
(३)आथर्वण ज्योतिषम् (अथर्वेदीयम्) द्विषष्ट्ट्युत्तरशत पद्यात्मकम्
एतेषां त्र्याणां प्रणेता लगधः
अष्टादशः पुरातनाः ज्योतिषप्रवर्तकाः श्रूयन्ते यथा--
     सूर्यः पितामहो व्यासो वशिष्ठोऽत्रि पराशरः
    कश्यपो नारदो गर्गो मरीचिर्मनुरंगिराः
    लोपशः पुलिनश्चैव च्यवनो यवनो भृगुः
    शौनकोऽष्टादशश्चेति ज्योतिशास्त्र प्रवर्तकाः
व्याकरणम्- मुखं व्याकरणं स्मृतम्व्याक्रियन्ते व्युत्पाद्यन्ते साधुः शब्दाः अनेनेति व्याकरणम्।
शास्त्रेष्वाद्यं व्याकरणं मुखं तत्र पाणिनेः।
तत्र रम्यं महाभाष्यं तत्रापि पस्पशा॥
शास्त्राणि भाषानिबद्धानि शास्त्रेषु सर्वेषु व्याकरणं प्रधानं भजते। वेदस्य रक्षार्थं व्याकरणस्य अध्ययनम् अत्यावश्यकम्। व्याकरणस्य प्रयोजनम् उक्तं महाभाष्ये-
रक्षोहागमलघ्वसंदेहाः प्रयोजनम्इति।(पस्पाशानिकम्)
रक्षार्थं वेदाध्येयं व्याकरणम्। व्याकरणानि अष्टौ इति श्रूयते-
प्रथमं प्रोच्यते ब्राह्मं द्वितीयमैन्द्रमुच्यते।
याम्यं प्राक्तं ततोरुद्रं वायव्यं वारुणं तथा।
सावित्रं तथा प्रोक्तमष्टमं वैष्णवं तथा।
नव व्याकरणानि प्रसिद्धानि सन्ति-
ऐन्द्रं चान्द्रं काशकृत्स्नं कौमारं शाकटायनम्।
सारस्वतं चापिशलं शाकलं पाणिनीयम्॥
पाणिनीयव्याकरणमति प्रसिद्धमस्ति। अस्य बहु ख्यातिः वर्तते।